473>||- मैं चाय की कुल्हड़-|| (1 )+(2)+(3)+(4)
473>(1)||- मैं चाय की कुल्हड़-|| (1 )
(2)||-चाय के कुल्हड़ की आत्मकथा-
(3)||-चाय के प्याली-||
(4)||--एक नीरव प्रतिवाद--||
=================================
473>(1)||- मैं चाय की कुल्हड़-|| (1 )
मैं तो हूँ चाय का कुल्हड़,
चाय पीनेके लिये हैं मेरा ईज्जत।
जव मेरा जरूरत खत्म हो जाता ,
मुझे फेंक दिया जाता।
मैं तो थी मिट्टी अरूप अनादर बेकार की ,
था मेरी लोभ रूप सम्मन अस्तित्य की।
कुम्हार आपना हातो से जतन से प्यार से,
सहलाकर बनाया अपनी पसंद से।
सुखाया प्यार से, फिर भट्टि मे तापाया जतन से ,
अति शुन्दर त्रुटिहीन बनाया मुझे।
परन्तु आज निष्ठुर चाय वाला,
मेरे पेटमे गर्म पानी और दूध डाला।
वनाया चाय खशबूदार, आपके लिये,
आप तो था पिपासी चाय पीनेके लिये।
आपने लिए मुझे हात मे बड़े प्यार से ,
लिये मुझे प्यारसे अपना चाहत से।
आपकी चेहरे पर था खुशी की लहर,
आपको ओठो के पर्स चुंबन जगाया शिहण।
धन्य मेरा जीबन,इस आदर और प्रेम से,
सार्थक मेरा जनम आपकी ओठोस्पर्श से।
परन्तु चाय खत्म होते ही,
आपने फेंक दी मुझे नाले में ।
यह आपमि कैसा बिचार,
थोरा सा भी नेही सोचा आप ने।
चुम्बन किये जिसको थोड़ीदेर पहले,
चाये खत्म होते ही फेक दीये नाली में।
मेरा ज्वल जाने की निहि की चिंता।
मै कोई प्रोतिबाद भी निहि की।
जताया नेहि खोभ कुछ भी,
भलेही चाएसे मेरा पेट ज्वालादी।
मैं मिट्टी, जड़ पदार्थ औऱ आप जीब,
इसीमे ही आपकी अहंकार, आप श्रेष्ठ जीब।
मै एकबार भी निहि किये प्रतिबाद,
किउकी मै कैसे करूँ आपकी प्रतिबाद।
मै भूल निहि सकती आपकि प्यार,
सहलीया प्रेमसे आपकी सारे अत्याचार ।
जब लियेथे मुझे हाथ में गर्म चाये के साथ,
आगर चाहते तो मै फट परते आपके हाथ।
थोरा चोचिये तब केया होता आपकि,
बदल जाती सारी खुशियां आशुमे आपकी।
आप मनुष्य जीब श्रेष्ठ हैं अहंकार,
हम जड़ पदार्थ मुझे भी हैं अधिकार।
हम प्रतिवाद नेही करती किउंकि
सहन शीलता हीं हैं मेरी धर्म।
मेरे प्यार का सोच ही मेरी कमजोरी,मै नेही लाचार।
मै सह लेती आपकि सारे अन्याय अत्याचार।।
<-©--●अनाथ●-->
【--anrc-01/06/2018--】
【=08:20:12 pm===48 L=】
जमशेदपुर, मानगो
==========================
(2)||-चाय के कुल्हड़ की आत्मकथा-||(2 )
मैं मिट्टी के चाय की प्याली हैं,
आप लोग मुझे कुल्हड़ कहते है।
मेरी जरुरत चाय पीते समय,
चाय ख़त्म मेरी जरुरत ख़त्म।
मैं तो थी मिट्टी बिना किसी रूप के,
मेरा ये रूप दिया कुम्हार ने।
बड़े जतन से,
अपने हाथों से।
सहलाकर बनाया सुखाया,
भट्टी में तपाया।
तब कही जाकर मैंने ये सुन्दर रूप पाया।
कुम्हार के दिए रूप से प्रसन्न मैंने,
अपना जन्म सार्थक पाया हमने।
परन्तु उस निष्ठुर चायवाले ने जब,
आपके लिए खुशबूदार चाय बनाया।
तो मै जल उठी उसके गर्म पानी और दूध से।
आपने चाय पिने की पिपासा से,
जब मुझे लगाया अपने होठों से,
तो मेरे बदन में सिरहन दौड़ गयी---
जीवन धन्य और सार्थक हुआ मेरी,
इस आदर और प्रेम चुम्बन से।
लेकिन चाय ख़त्म होते ही,
आपने मुझे फेक दिया नाले में।
जरा सा भी नहीं सोचा,
कुछ देर पहले,
लगाये आपने होठों से,
प्रेम से चूमा था जिसे।
मैंने नहीं किया प्रतिवाद आपसे,
मेरे जल जाने के।
न जताया कोई क्षोभ आपसे,।
मैं मिट्टी जड़ पदार्थ,
और आपने श्रेष्ठ जीव जथार्थ।
आपको जानते हैं सारे संसार,
आपको हैं श्रेष्ठ होनेका अहंकार।
मैंने सब कुछ सहन किया,
केई प्रतिवाद निहि किया।
क्योंकि,
मैं भूल नहीं सकती वही प्रेम,
आपके अधरों से लगना वो आपका प्रेम।
इसलिए सह लिया आपके सारे अत्याचार।
जब लिया था आपने मुझे अपने हाथो में,
तब मैं फट भी सकती थी।
जरा सोचिये,
तब क्या होता आपके हाथों का,
बदल जाती आपकी ख़ुशी.. गम में।
आपको श्रेष्ठ जीव हैं अहंकार,
मैं जड़ पदार्थ,
मुझे भी हैं प्रतिवाद का अधिकार ... पर नहीं,
सहनशीलता ही मेरा धर्म।
आपके अधरों से लगना मेरी कमजोरी,
मैं नहीं लाचार।
-©--●अनाथ●-->
【--anrc-01/06/2018--】
【=02:10:33 am===51 L=】
जमशेदपुर, मानगो
======================
(3)||-चाय के प्याली-||
मैं मिट्टी के चाय की प्याली हैं,
आप लोग मुझे कुल्हड़ कहते है।
मेरी जरुरत चाय पीते समय,
चाय ख़त्म मेरी जरुरत ख़त्म।
मैं तो थी मिट्टी बिना किसी रूप के,
मेरा ये रूप दिया कुम्हार ने।
बड़े जतन से,
अपने हाथों से।
सहलाकर बनाया सुखाया,
भट्टी में तपाया।
तब कही जाकर मैंने ये सुन्दर रूप पाया।
कुम्हार के दिए रूप से प्रसन्न मैंने,
अपना जन्म सार्थक पाया हमने।
परन्तु उस निष्ठुर चायवाले ने जब,
आपके लिए खुशबूदार चाय बनाया।
तो मै जल उठी उसके गर्म पानी और दूध से।
आपने चाय पिने की पिपासा से,
जब मुझे लगाया अपने होठों से,
तो मेरे बदन में सिरहन दौड़ गयी---
जीवन धन्य और सार्थक हुआ मेरी,
इस आदर और प्रेम चुम्बन से।
लेकिन चाय ख़त्म होते ही,
आपने मुझे फेक दिया नाले में।
जरा सा भी नहीं सोचा,
कुछ देर पहले,
लगाये आपने होठों से,
प्रेम से चूमा था जिसे।
-©--●अनाथ●-->
【--anrc-18/06/2018--】
【=08:10:33 pm=== L=】
=================≠
(4)||--एक नीरव प्रतिवाद--||
मैं -चाय के कुल्हड़ नहीं लाचार।
मुझे भी हैं प्रतिवाद का अधिकार ... पर नहीं,
सहनशीलता ही मेरा धर्म।
मैंने नहीं किया प्रतिवाद आपसे,
मेरे जल जाने के।
न जताया कोई क्षोभ आपसे,।
मैं मिट्टी जड़ पदार्थ,
और आपने श्रेष्ठ जीव जथार्थ।
आपको जानते हैं सारे संसार,
आपको हैं श्रेष्ठ होनेका अहंकार।
मैंने सब कुछ सहन किया,
केई प्रतिवाद निहि किया।
क्योंकि,
मैं भूल नहीं सकती वही प्रेम,
आपके अधरों से लगना वो आपका प्रेम।
इसलिए सह लिया आपके सारे अत्याचार।
जब लिया था आपने मुझे अपने हाथो में,
तब मैं फट भी सकती थी।
जरा सोचिये,
तब क्या होता आपके हाथों का,
बदल जाती आपकी ख़ुशी.. गम में।
आपको श्रेष्ठ जीव हैं अहंकार,
मैं जड़ पदार्थ,
सहनशीलता ही मेरा धर्म।
आपके अधरों से लगना मेरी कमजोरी,
मैं नहीं लाचार।
-©--●अनाथ●-->
【--anrc-18/06/2018--】
【=01:10:33 am=== L=】
======================
473>(1)||- मैं चाय की कुल्हड़-|| (1 )
मैं तो हूँ चाय का कुल्हड़,
चाय पीनेके लिये हैं मेरा ईज्जत।
जव मेरा जरूरत खत्म हो जाता ,
मुझे फेंक दिया जाता।
मैं तो थी मिट्टी अरूप अनादर बेकार की ,
था मेरी लोभ रूप सम्मन अस्तित्य की।
कुम्हार आपना हातो से जतन से प्यार से,
सहलाकर बनाया अपनी पसंद से।
सुखाया प्यार से, फिर भट्टि मे तापाया जतन से ,
अति शुन्दर त्रुटिहीन बनाया मुझे।
कुम्हार के दिये हुये रूप से मै हुयें प्रशन्न,
कुम्हारने किये मेरा जन्म सार्थक धन्य।परन्तु आज निष्ठुर चाय वाला,
मेरे पेटमे गर्म पानी और दूध डाला।
वनाया चाय खशबूदार, आपके लिये,
आप तो था पिपासी चाय पीनेके लिये।
आपने लिए मुझे हात मे बड़े प्यार से ,
लिये मुझे प्यारसे अपना चाहत से।
आपकी चेहरे पर था खुशी की लहर,
आपको ओठो के पर्स चुंबन जगाया शिहण।
धन्य मेरा जीबन,इस आदर और प्रेम से,
सार्थक मेरा जनम आपकी ओठोस्पर्श से।
परन्तु चाय खत्म होते ही,
आपने फेंक दी मुझे नाले में ।
यह आपमि कैसा बिचार,
थोरा सा भी नेही सोचा आप ने।
चुम्बन किये जिसको थोड़ीदेर पहले,
चाये खत्म होते ही फेक दीये नाली में।
मेरा ज्वल जाने की निहि की चिंता।
मै कोई प्रोतिबाद भी निहि की।
जताया नेहि खोभ कुछ भी,
भलेही चाएसे मेरा पेट ज्वालादी।
मैं मिट्टी, जड़ पदार्थ औऱ आप जीब,
इसीमे ही आपकी अहंकार, आप श्रेष्ठ जीब।
मै एकबार भी निहि किये प्रतिबाद,
किउकी मै कैसे करूँ आपकी प्रतिबाद।
मै भूल निहि सकती आपकि प्यार,
सहलीया प्रेमसे आपकी सारे अत्याचार ।
जब लियेथे मुझे हाथ में गर्म चाये के साथ,
आगर चाहते तो मै फट परते आपके हाथ।
थोरा चोचिये तब केया होता आपकि,
बदल जाती सारी खुशियां आशुमे आपकी।
आप मनुष्य जीब श्रेष्ठ हैं अहंकार,
हम जड़ पदार्थ मुझे भी हैं अधिकार।
हम प्रतिवाद नेही करती किउंकि
सहन शीलता हीं हैं मेरी धर्म।
मेरे प्यार का सोच ही मेरी कमजोरी,मै नेही लाचार।
मै सह लेती आपकि सारे अन्याय अत्याचार।।
<-©--●अनाथ●-->
【--anrc-01/06/2018--】
【=08:20:12 pm===48 L=】
जमशेदपुर, मानगो
==========================
(2)||-चाय के कुल्हड़ की आत्मकथा-||(2 )
मैं मिट्टी के चाय की प्याली हैं,
आप लोग मुझे कुल्हड़ कहते है।
मेरी जरुरत चाय पीते समय,
चाय ख़त्म मेरी जरुरत ख़त्म।
मैं तो थी मिट्टी बिना किसी रूप के,
मेरा ये रूप दिया कुम्हार ने।
बड़े जतन से,
अपने हाथों से।
सहलाकर बनाया सुखाया,
भट्टी में तपाया।
तब कही जाकर मैंने ये सुन्दर रूप पाया।
कुम्हार के दिए रूप से प्रसन्न मैंने,
अपना जन्म सार्थक पाया हमने।
परन्तु उस निष्ठुर चायवाले ने जब,
आपके लिए खुशबूदार चाय बनाया।
तो मै जल उठी उसके गर्म पानी और दूध से।
आपने चाय पिने की पिपासा से,
जब मुझे लगाया अपने होठों से,
तो मेरे बदन में सिरहन दौड़ गयी---
जीवन धन्य और सार्थक हुआ मेरी,
इस आदर और प्रेम चुम्बन से।
लेकिन चाय ख़त्म होते ही,
आपने मुझे फेक दिया नाले में।
जरा सा भी नहीं सोचा,
कुछ देर पहले,
लगाये आपने होठों से,
प्रेम से चूमा था जिसे।
मैंने नहीं किया प्रतिवाद आपसे,
मेरे जल जाने के।
न जताया कोई क्षोभ आपसे,।
मैं मिट्टी जड़ पदार्थ,
और आपने श्रेष्ठ जीव जथार्थ।
आपको जानते हैं सारे संसार,
आपको हैं श्रेष्ठ होनेका अहंकार।
मैंने सब कुछ सहन किया,
केई प्रतिवाद निहि किया।
क्योंकि,
मैं भूल नहीं सकती वही प्रेम,
आपके अधरों से लगना वो आपका प्रेम।
इसलिए सह लिया आपके सारे अत्याचार।
जब लिया था आपने मुझे अपने हाथो में,
तब मैं फट भी सकती थी।
जरा सोचिये,
तब क्या होता आपके हाथों का,
बदल जाती आपकी ख़ुशी.. गम में।
आपको श्रेष्ठ जीव हैं अहंकार,
मैं जड़ पदार्थ,
मुझे भी हैं प्रतिवाद का अधिकार ... पर नहीं,
सहनशीलता ही मेरा धर्म।
आपके अधरों से लगना मेरी कमजोरी,
मैं नहीं लाचार।
-©--●अनाथ●-->
【--anrc-01/06/2018--】
【=02:10:33 am===51 L=】
जमशेदपुर, मानगो
======================
(3)||-चाय के प्याली-||
मैं मिट्टी के चाय की प्याली हैं,
आप लोग मुझे कुल्हड़ कहते है।
मेरी जरुरत चाय पीते समय,
चाय ख़त्म मेरी जरुरत ख़त्म।
मैं तो थी मिट्टी बिना किसी रूप के,
मेरा ये रूप दिया कुम्हार ने।
बड़े जतन से,
अपने हाथों से।
सहलाकर बनाया सुखाया,
भट्टी में तपाया।
तब कही जाकर मैंने ये सुन्दर रूप पाया।
कुम्हार के दिए रूप से प्रसन्न मैंने,
अपना जन्म सार्थक पाया हमने।
परन्तु उस निष्ठुर चायवाले ने जब,
आपके लिए खुशबूदार चाय बनाया।
तो मै जल उठी उसके गर्म पानी और दूध से।
आपने चाय पिने की पिपासा से,
जब मुझे लगाया अपने होठों से,
तो मेरे बदन में सिरहन दौड़ गयी---
जीवन धन्य और सार्थक हुआ मेरी,
इस आदर और प्रेम चुम्बन से।
लेकिन चाय ख़त्म होते ही,
आपने मुझे फेक दिया नाले में।
जरा सा भी नहीं सोचा,
कुछ देर पहले,
लगाये आपने होठों से,
प्रेम से चूमा था जिसे।
-©--●अनाथ●-->
【--anrc-18/06/2018--】
【=08:10:33 pm=== L=】
=================≠
(4)||--एक नीरव प्रतिवाद--||
मैं -चाय के कुल्हड़ नहीं लाचार।
मुझे भी हैं प्रतिवाद का अधिकार ... पर नहीं,
सहनशीलता ही मेरा धर्म।
मैंने नहीं किया प्रतिवाद आपसे,
मेरे जल जाने के।
न जताया कोई क्षोभ आपसे,।
मैं मिट्टी जड़ पदार्थ,
और आपने श्रेष्ठ जीव जथार्थ।
आपको जानते हैं सारे संसार,
आपको हैं श्रेष्ठ होनेका अहंकार।
मैंने सब कुछ सहन किया,
केई प्रतिवाद निहि किया।
क्योंकि,
मैं भूल नहीं सकती वही प्रेम,
आपके अधरों से लगना वो आपका प्रेम।
इसलिए सह लिया आपके सारे अत्याचार।
जब लिया था आपने मुझे अपने हाथो में,
तब मैं फट भी सकती थी।
जरा सोचिये,
तब क्या होता आपके हाथों का,
बदल जाती आपकी ख़ुशी.. गम में।
आपको श्रेष्ठ जीव हैं अहंकार,
मैं जड़ पदार्थ,
सहनशीलता ही मेरा धर्म।
आपके अधरों से लगना मेरी कमजोरी,
मैं नहीं लाचार।
-©--●अनाथ●-->
【--anrc-18/06/2018--】
【=01:10:33 am=== L=】
======================
Comments
Post a Comment